वैसे तो झारखंड का पूरा आदिवासी बहुल क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार सहित तमाम एक सामान्य जीवन जीने के मानक से महरूम है। आदिवासी समुदाय अपने तमाम अधिकारों से वंचित है।
जंगल समस्त सृष्टी के जीवन का स्रोत है। पूरी दुनिया वायुमंडल में तेजी से बढ़ती ग्रीन हाउस गैस की मात्रा को लेकर चिंतित है, वैश्विक स्तर पर आदिवासी इलाकों में फैले जंगलों को धरती बचाने के एक बड़े प्राकृतिक उपाय के रूप में देखा जा रहा है वहीं झारखंड में जंगल बचाने को समर्पित आदिवासी और वनाश्रित समुदायों को जंगल से ही बेदखल करने का षडयंत्र रचा जा रहा है।
लोगों के पास जमीन तो है लेकिन खेती के लिए सिंचाई की व्यवस्था न होने के कारण रोजगार के लिए लोग दूसरे राज्यों में पलायन को मजबूर है।
विगत 5 वर्षों के केन्द्र सरकार द्वारा वन अधिकार कानून, पेसा कानून सहित आदिवासियों के रूढ़िगत कानूनों को कमजोर किया गया है, जबकि सारंडा वन्यजीव अभ्यारण्य के मामले में सर्वोच्च नयायालय राज्य सरकार को आदेशित करती है कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 2002 के तहत सरकार स्थानीय समुदायों के बाद अभ्यारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों और पारिस्थितिकीय गलियारों से सटे क्षेत्रों और दो संरक्षित क्षेत्रों को एक दूसरे से जोड़ने वाले इलाकों को संरक्षित क्षेत्र घोषित करे।
लेकिन सर्वोच्च नयायालय का आदेश ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है।
ऐसे हालात लगभग राज्य के सभी आदिवासी बहुल क्षेत्रों में हैं लेकिन आज हम बात करेंगे लातेहार जिला के नवरनागु गांव की जो उपर्युक्त तमाम संकटों जूझ रहा है और उसपर एक और संकट विस्थापन व पुनर्वास का मंडरा रहा है।
प्रस्तावित पुनर्वास स्थल में प्रथम चरण में नवरनागू गांव के 19 परिवारों को पुनर्वासित करने की योजना है। जिसमें पाटन गांव की कुल 97.27 एकड़ वनभूमि का अपयोजन की जाएगी। वहीं दूसरे चरण में पाटन एवं बरवैया कला मिलाकर 98.21 वनभूमि का अपयोजन होगा।
इस खबर से गांव में हड़कंप है और ग्रामीणों में आक्रोश पनपने की चर्चा जोरों पर है।
बताते चलें कि झारखंड के लातेहार जिला अंतर्गत बरवाडीह प्रखंड का एक गांव है नवरनागु, जो प्रखंड मुख्यालय से 30 किमी दूर है, यही वजह है कि नवरनागु गांव में विकास की रोशनी तो दूर उसकी किरण तक दिखाई नहीं देती है।
यहां मुख्य रूप से खेरवार व उरांव आदिवासी समुदाय के 38 परिवार के लोग बसते हैं, जिनकी कुल आबादी 182 है।
यहां के विकास की किरण का आलम यह है कि यहां शिक्षा व्यवस्था के नाम पर एक प्राथमिक विद्यालय है, जो गांव के ही एक शिक्षक के भरोसे संचालित होता है।
उच्च शिक्षा हेतु बच्चों को अन्य गांवों में जाना पड़ता है। लगभग 5 किमी दूर पत्रादिह में एक मिशन स्कूल, लगभग 3 किमी दूर करमडीह गांव में है मध्य विद्यालय और लगभग 8 किमी दूरी पर स्थित लात में है हाई स्कूल।
गांव में आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है। तनवाई और नवरनागु के बीच तनवाई गांव के सीमा पर एक आंगनबाड़ी केंद्र स्थित है। दोनों गांवों की दूरी लगभग 5 किमी है, जिस कारण छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को आंगनबाड़ी की सुविधा से वंचित रहना पड़ता है।
रोजगार की स्थिति यह है कि गांव में केवल मनरेगा आधारित योजनाएं चलती हैं, अन्य कोई रोजगार का साधन नहीं है। ऐसे में अधिकांश ग्रामीण रोजगार की तलाश में केरल आदि राज्यों में पलायन करते हैं।
स्वास्थ्य सुविधा की बात करें तो ग्रामीण स्थानीय झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर हैं।
निकटतम आयुष्मान स्वास्थ्य केंद्र खम्भीखास में है, जो यहां से 3 किमी दूरी पर स्थित है।
वहीं समुदायिक स्वास्थ्य उपकेंद्र लात स्वास्थ्यकर्मियों की कमी के कारण बंद पड़ा रहता है।
बिजली सुविधा को चूँचूँ का मुरब्बा कह सकते हैं क्योंकि यहां तार और पोल लगाए तो गए हैं, लेकिन बिजली आपूर्ति अब तक शुरू नहीं हुई है। गांव सहित पूरा पंचायत डिबरी युग में जी रहा है।
पेयजल व्यवस्था का आलम यह है कि ग्रामीण चापाकल और कुएं पर निर्भर हैं, जलमीनार है लेकिन वह भी कभी-कभी शोभा की वस्तु बना रहता है, क्योंकि सोलर प्लेट बरसात में काम नहीं करता है और गर्मी में बोरिंग की गहराई कम रहने से पानी नहीं आ पाता है।
जल जीवन मिशन वेबसाइट पर गांव के सभी घरों को नल जल योजना से जोड़ा दिखाया गया है, लेकिन सच तो यह है कि किसी भी घर में नल कनेक्शन उपलब्ध नहीं है।
राशन व्यवस्था के तौर पर सभी परिवारों के पास राशन कार्ड है। लोग राशन के लिए 3 किमी दूरी पर स्थित दुकान पर जाते हैं, जहां से ग्रामीण राशन प्राप्त करते हैं।
खेती और आजीविका के मामले में गांव के अधिकांश लोग खेती पर निर्भर हैं। खेती भी पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। क्योंकि यहां सिंचाई का कोई भी साधन नहीं है। सिंचाई के लिए ग्रामीण केवल वर्षा के पानी पर निर्भर हैं। यही वजह है कि यहां की खेती की मुख्य फसल धान और मक्का है। गेहूं वगैरह की फसल की उम्मीद बेमानी है।
सड़क एवं परिवहन की बात करें तो गांव की सड़क कच्ची है। करमडीह सीमा से लगभग 100 मीटर का खड़ा चढ़ान फॉरेस्ट विभाग के अंतर्गत आता है, जिससे सड़क निर्माण की संभावना नदारद है।
दूसरी तरफ जो कच्ची सड़क है उसके रखरखाव की सरकारी स्तर से कोई व्यवस्था नहीं है, ग्रामीण श्रमदान से इसकी मरम्मत करते हैं। वहीं बरसात के दिनों में सड़क पर फैले कीचड़ के कारण यातायात लगभग ठप हो जाता है। परिवहन हेतु ग्रामीणों को 3 किमी पैदल चलना पड़ता है, तब कहीं जाकर वाहन की सुविधा मिलती है।
संचार संपर्क की सुविधा बिल्कुल नहीं है क्योंकि गांव में मोबाइल नेटवर्क नहीं है। किसी प्रकार का संचार माध्यम उपलब्ध नहीं है।
आवास एवं स्वच्छता की स्थिति यह है कि गांव के सभी मकान कच्चे हैं। किसी भी परिवार को केन्द्र सरकार का प्रधानमंत्री आवास योजना या राज्य सरकार का बिरसा आवास उपलब्ध नहीं है। वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत अभियान के तहत किसी भी परिवार को शौचालय की सुविधा नहीं है। लोग खुले में शौच के लिए विवश हैं।
बता दें कि प्रधानमंत्री आवास योजना भारत सरकार की एक आवास मिशन है जिसका उद्देश्य सभी पात्र परिवारों को पक्का घर उपलब्ध कराना है, जिसमें शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के लिए है।
ग्रामीण क्षेत्रों के कच्चे घरों में रहने वाले ग्रामीण परिवारों को पक्के घर और आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना है, जैसे शौचालय, पानी की आपूर्ति और बिजली वगैरह।
झारखंड सरकार की बिरसा आवास योजना, जिसे बिरसा आवास निर्माण योजना के नाम से भी जाना जाता है। यह योजना विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के उन परिवारों के लिए है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिनके पास रहने के लिए घर नहीं है। जिसके तहत लाभार्थियों को तीन किस्तों में वित्तीय सहायता दी जाती है।
उक्त तमाम विसंगतियों बीच गांव वालों के लिए वन विभाग परशानियों का सबब बनता जा रहा है।
कहना ना होगा कि पलामू व्याघ्र परियोजना के बहाने वन विभाग आए दिन लातेहार ज़िले के आदिवासियों के लिए मुश्किलें पैदा करता जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि 28 जनवरी 2025 को पलामू व्याघ्र परियोजना के एक उच्च अधिकारी प्रजेश जेना द्वारा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के समक्ष एक आवेदन जमा किया जाता है, जिसका संदर्भ लातेहार ज़िले में स्थित नवरनागु गांव के पुनर्वास से सम्बंधित होता है।
आवेदन में यह बताया जाता है कि नवरनागु गांव पलामू व्याघ्र परियोजना के कोर क्षेत्र में अवस्थित है, अतः इस गांव का स्वैक्षिक पुनर्वास बाघों के संरक्षण के लिए अति आवश्यक है। इसी क्रम में 4 अन्य गावों का नाम ज़िक्र किया जाता है, जिसमें तनवई, पोलपोल, चापिया और टोटकी शामिल है, जिनका पुनर्वास होना परियोजना के लिए आकांक्षित है।
आवेदन में पुनर्वास और पुनर्वास हेतु चयनित जगह के लिए नवरनागु गांव के ग्राम सभा की सहमति (रजिस्टर की फ़ोटोकॉपी द्वारा) दिखायी जाती है। जबकि वहां की ग्रामसभा ऐसी किसी भी सहमति से इन्कार करती है।
वहीं दूसरी तरफ उप निदेशक द्वारा अब तक तैयार किए गए कागजातों के अनुसार इसी साल 11 जनवरी को नवरनागू गांव के 23 रैयतों ने पाटन वन भूमि क्षेत्र का दौरा कर पुनर्वास हेतु जमीन पसन्द किया है। जिसमें सरकारी रिकॉर्ड बताता है कि वहां का ग्राम प्रधान भी शामिल था।
प्रस्तावित पुनर्वास स्थल में प्रथम चरण में नवरनागू गांव के 19 परिवारों को पुनर्वासित करने की योजना है। जिसमें पाटन गांव की कुल 97.27 एकड़ वनभूमि का अपयोजन की जाएगी। वहीं दूसरे चरण में पाटन एवं बरवैया कला मिलाकर 98.21 वनभूमि का अपयोजन होगा। ये सारा खेल पलामू से किया जा रहा है, इस निर्णय प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप में लातेहार वन विभाग की कोई भूमिका नजर नहीं आ रही है।
इस बीच, नवरनागू गांव के ग्रामीणों ने 17 अगस्त 2025 को पलामू जिले के पाटन प्रखंड के उताकी पंचायत अंतर्गत बघवर गांव में स्थित धुमकुड़िया भवन में ग्राम सभा की एक बैठक की। जिसमें ग्रामीणों ने वन विभाग का जोरदार विरोध किया। ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा कि हम किसी भी हाल में अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे और किसी भी हाल में हम विभाग की मनमानी अफसरशाही नहीं चलने देंगे।
बैठक में ग्रामीणों ने में तय किया कि हम अपने वन क्षेत्र में किसी को नहीं बसने देंगे। बैठक में एक संकल्प पारित कर कहा गया कि नवरनागू गांव के ग्राम प्रधान, जिले के उपायुक्त व वन प्रमण्डल अधिकारी लातेहार सहित उप निदेशक, पलामू ब्याघ्र परियोजना मेदिनीनगर को अपनी वनभूमि का सामुदायिक दावा समर्पित किया जाएगा और दूसरे चरण में प्रस्तावित वन भूमि को अमीन से मापी कराकर वन सम्पदा का आंकलन किया जायेगा।
और अंत में उप निदेशक के कार्यालय के समक्ष जोरदार आन्दोलन चलाया जाएगा।
विदित हो कि ग्राम सभा पाटन (जिसकी दूसरी सीमा पर नवरनागू है) ने अपने सम्पूर्ण वनभूमि का सामुदायिक दावा 2020 में ही अनुमण्डल को समर्पित कर दिया है। जिसकी समीक्षा गत 14 जून 2024 को अनुमण्डल स्तरीय समिति के द्वारा की गई है और कुछ त्रुटि निराकरण हेतु ग्राम वन अधिकार समिति को वापस की गई है।
वनाधिकार कानून की धारा 4 (5) स्पष्ट कहती है कि जब तक समर्पित दावों पर प्राधिकृत समितियों का यथोचित निर्णय नहीं हो जाता है तब तक अधिभोगाधीन वन भूमि से कोई उनको बेदखल नहीं करेगा। पीटीआर नवरनागू एवं पाटन दोनों गांवों के मामले में इस कानून का घोर उल्लंघन कर रहा है।
सिर्फ इतना ही नहीं इसी वर्ष मनिका के जेरुआ, लंका, कोपे में वन विभाग पौधारोपण के नाम पर ऐसे ही गैरक़ानूनी हस्तक्षेप कर रहा था, जहां से ग्रामीणों ने वन विभाग के कर्मियों को खदेड़ा। उन गांवों में आज तक वन विभाग ने आगे काम कराने का दुस्साहस नहीं कर सका।
बताते चलें कि इन सभी प्रकरणों में सरकार की या वन विभाग की मंशा केवल बाघों के लिए ज़मीन उपलब्ध कराने पर टिकी हुई है। यह मंशा न केवल आदिवासी हित एवं विचारधारा के विपरीत है, बल्कि यह वन्य संरक्षण अधिनियम (1972), जिसका हवाला खुद एनटीसीए देती है और वन अधिकार अधिनियम 2006 के संसोधन के विरुद्ध है।
इस क़ानून (संसोधन) के भाग 4(i) और 5(ii) के विपरीत है जिसमें यह स्पष्टता से लिखा है कि कोई भी कोर क्षेत्र सम्बंधित नीतियां आदिवासियों के अधिकार को क्षति नहीं पहुंचाएगी। क़ानून में इस बात का भी ज़िक्र है कि सरकार को आदिवासियों के साथ मिलकर यह तय करना होगा कि आदिवासियों के कोर क्षेत्र में रहने से क्या वन्य जीवन पर गहरा असर पड़ता है?
इन क़ानूनों के मूल में कहीं न कहीं आदिवासियों के प्रकृति के प्रति लगाव की स्वीकृति है। इनमें यह स्वीकृति है कि आदिवासी समुदाय इन कथित निर्धारित क्षेत्रों में बाघों (और अन्य प्राकृतिक सृष्टि) के साथ सदियों से रहता आ रहा है।
परंतु वन विभाग की पुनर्वास नीतियों में ऐसी भावना की कमी का कारण क्या आदिवासियों को उनकी आदिवासियत से बेदखल करने की नीयत है?
ऐसे में आदिवासी समाज की ओर से एक गम्भीर प्रश्न उठता है – जब सरकारी विभाग ही सरकारी प्रक्रियाओं की अनदेखी कर आदिवासी समाज को उत्पीड़ित करता है तो, ऐसी परिस्थिति में आदिवासी समाज क्या करेगा?